<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486</id><updated>2012-03-21T00:12:55.560-07:00</updated><title type='text'>उस सुबह की ख़ातिर...</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>7</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>25</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-844031516468708928</id><published>2010-10-10T01:55:00.000-07:00</published><updated>2010-10-10T02:28:23.436-07:00</updated><title type='text'>जो जिंदगी के अंधेरों में टिमटिमाती रही</title><content type='html'>घर की माली हालत ने महज़बी को अदाकारा बनाया तो जिंदगी ने एक बेहतरीन शायरा। खुदगर्ज़ और मतलबपरस्ती के कड़वे तजुरबों ने मीना कुमारी (महज़बी) के हुनर को शायरी की शक्ल दे दी। पूरी जवानी  अब्बा अली बख्श के इशारों पर घूमती रहीं और शादी के बाद शौहर कमाल अमरोही के सलूक ने उन्हें तोड़ दिया। १९५२ में शादी की, महज आठ साल में अलग हुई और १९६४ में तलाक ले लिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दौलत के लिए पिता की दीवानगी और कमाल अमरोही की बेवफाई ने मीना कुमारी को इतना मायूस कर दिया कि उन्होंने शराब को अपना साथी बना लिया। ज़िन्दगी के आखिरी पड़ाव में जब मीना कुमारी बीमार रहने लगीं और घर में पैसे की आमद बंद हो गई तो बहन-बहनोई ने भी मुंह फेर लिया। निराशा भरी ज़िन्दगी और माहौल में वो लंबे समय तक नहीं टिक पायीं और ३९ साल की उम्र में दुनिया से विदा ली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तलाक हो जाने के बाद भी मीना कुमारी ने कमाल अमरोही की फिल्म पाकीज़ा में काम किया। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान वो बीमार हुईं। फिल्म के गाने इन्हीं लोगों ने और ठाड़े रहियो फिल्माते वक्त वह कई बार गश खाकर गिर पड़ीं, लेकिन फिल्म में काम करना जारी रखा। पाकीज़ा के प्रीमियर पर अखबार नवीसों ने इसे एक औसत दर्जे की फिल्म करार दिया, लेकिन यह अफवाह भी खूब फैली कि पाकीज़ा मीना कुमारी की आखिरी फिल्म हो सकती है। उनके चाहने वालों की भीड़ सिनेमाघर में लम्बे समय तक बनी रही और पाकीज़ा हिंदी सिनेमा की अमर फिल्म हो गई। फिल्म रिलीज होने के दो महीने बाद मीना कुमारी इस दुनिया से चल बसीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्मों के ज़रिए मीना कुमारी जब तक पैसा कमाती रहीं, अपने पिता, रिश्तेदार और चाहने वालों की चहेती बनी रहीं। सात साल की उम्र में जब पहली बार बतौर मेहनताना तीस रुपए लेकर घर पहुंचीं तो अब्बा अली बख्श ने गोद में उठाकर खिलाया। मीना बखूबी जानती थीं कि रिश्तेदार और चाहने वालों को उनसे कम और उनके पैसे से ज्य़ादा प्यार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मीना कुमारी बचपन से ज़हीन और दिखने में खूबसूरत थीं और यही वजह थी कि फिल्मी दुनिया में कदम रखते ही बड़ी बहन खुर्शीद को भी पीछे छोड़ दिया। निर्देशक विजय भट्ट ने मीना कुमारी में अदाकारी के हुनर को बखूबी पहचानते थे, वो काम देते गए और मीना तारीख़ बनाती गयीं. १९५२ में फिल्म बैजू बावरा की कामयाबी से मीना की मकबूलियत गई गुना बढ़ गई, और मीना इस फिल्म में बेहतरीन अदाकारी के लिए फिल्मफेयर के ख़िताब से नवाजी गयीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने फिल्मी करियर में मीना कुमारी ने पैसा, शोहरत और इज्जत खूब कमाई, लेकिन ज़िन्दगी भर एक अदद प्यार के लिए तरसती रहीं। शादीशुदा कमाल अमरोही से १५ बरस छोटी होने के बावजूद प्यार किया, लेकिन आठ साल तक साथ रहने के बाद खुद को कमाल से अलग कर लिया और ज़िन्दगी भर अपनों की तलाश में रोती रहीं.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-844031516468708928?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/844031516468708928/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=844031516468708928' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/844031516468708928'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/844031516468708928'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2010/10/blog-post_10.html' title='जो जिंदगी के अंधेरों में टिमटिमाती रही'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-8766542229197292407</id><published>2010-10-10T01:53:00.000-07:00</published><updated>2010-10-10T01:54:22.398-07:00</updated><title type='text'>चार्ली चैपलिन की याद में</title><content type='html'>जिन लोगों के घर में रविवार के खाने का इंतजाम नहीं होता था, उसके देश में उसे भिखमंगा कहा जाता था। वह भी भिखमंगा था। मां पागल हो गई थी, और पिता के साथ बिताया कोई भी पल उसे याद नहीं। एक वक्त ऐसा भी आया, कि जिंदा रहने के लिए गिरजाघर की खैरात का सहारा लेना पड़ा। दोस्तों के घरों के आस-पास इसलिए मंडराया करता था, ताकि कोई उसे खाने पर बुला ले। हर शाम भूख से पेट जलता, और हर सुबह एक नए धंधे के बारे में सोंचता। ऐसा धंधा, जिसमें कम-से-कम खाने का इंतजाम ज़रूर हो, मसलन- मछली या चिप्स बेचना, या फिर पंसारी की दुकान खोलना। भूख से निजात पाने के लिए उसने अखबार बेंचा, खिलौने बनाए और डॉक्टर की क्लीनिक में काम किया। मां एक पब में गाना गाती थी। एक दिन वह भी साथ गया, तब उसकी उम्र सिर्फ पांच साल थी। मां की तबीयत खराब थी, और आवाज बैठी हुई। उसने जैसे गाना शुरू किया, पब में बैठे लोगों ने गालियों की झड़ी लगा दी। कुछ तो मंच की ओर जूते-चप्पल फेकने लगे। वह अचानक मंच की ओर दौड़ता है, और खुद नाचने-गाने लगता है। कुछ ही देर में मंच पर सिक्कों की बारिश सी होने लगी। वह यकायक रुकता है, और सिक्के बटोरता है। लोग कहते हैं, कि नाचते रहो, सिक्के और मिलेंगे। लेकिन उसे डर है, कि कहीं स्टेज मैनेजर सारे सिक्के हड़प ना जाए। जब सिक्के एक रूमाल में बांधकर उसकी मां के हाथ में थमा दिए गए, तब उसने दुबारा नाचना शुरु किया।&lt;br /&gt;वह दिन भर छोटा-मोटा काम ढूंढकर अपनी भूख मिटाता, और रात होते ही घर लौटता, जहां रोशनी नहीं गंदे पानी की बास और मरे हुए कीड़े मकोड़ो का जमवाड़ा होता था। घर जाने से पहले, वह एक ज़रूरी काम करना नहीं भूलता था। वह अपने जूते चमकाता, कपड़े झाड़ता और कॉलर साफ करके फोर्ड स्ट्रीट में ब्लैक मोर थिएटर एजेंसी के इर्द-गिर्द मंडराने लगता। वहां घूमते और काम करते अदाकारों को देखना उसे खूब भाता था। और एक दिन वह हुआ, जिसका इंतजार उसे शिद्दत से था। वह उस खाकी लिफाफे को बार-बार निहारे जा रहा था, जिसमें एक नाटक में काम करने का उसके लिए प्रस्ताव था। उसी वक्त उसने ठान लिया, कि बस बहुत हो चुका, भूख और गरीबी से अब मेरा कोइ रिश्ता नहीं। और वही हुआ। बारह साल की उम्र में इंग्लैंड का सबसे लोकप्रिय बाल कलाकार बना, १९ बरस की उम्र में इंग्लिश थिएटर में अपनी जगह बनाई और कार्नो कंपनी के सबसे कामयाब कॉमेडियन के रूप में पहचाने गए। वे अपनी कीमत खुद तय करते थे, और लोग उसे मानते थे। २१ साल की उम्र में अमेरिका की उड़ान भरी। महज तीन साल के बाद वे पर्दे पर दिखने लगे। जब २७ साल के हुए, तो म्यूचुअल फिल्म कॉरपोरेशन ने फिल्म बनाने के लिए ६,७०,००० डॉलर दिए। उन्होंने बचपन में अपना पेट भरने के लिए खिलौने बनाए थे, और अब न्यूयार्क के डिपार्टमेंट स्टोर्स में उनके नाम और चरित्र के खिलौने बिक रहे थे। एक वक्त आया, कि उनकी अदाकारी ने पूरी दुनिया को अपने आगोश मे ले लिया। हर फिल्म के साथ उनकी मकबूलियत बढ़ती जाती, और वे सभी से मनमाना दाम वसूलते। राजा हो रंक, उन्हें देखकर हर कोई हंसता था। वे लोगों को ऐसे वक्त में हंसा रहे थे, जब पूरी दुनिया विश्व युद्ध की मार-काट से लाचार हो गई थी। पहले विश्वयुद्ध से उनके हंसाने का सिलसिला दूसरे विश्वयुद्ध तक जारी रहा। उनकी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में लोगों की ज़िन्दगी में दुबारा रंग भर रही थी। बचपन में खाने के लिए दोस्तों के घर पर मंडराने वाले बच्चे के घर महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंसटीन खाना खाने आए। आइंसटीन को उनके घर जाना बेहद पसंद था। वे चले गए, दुबारा आने का वादा करके। वे, अपने ज़माने के अकेले आदमी थे, जिनके दोस्त हर मुल्क, क्षेत्र और उम्र के थे। दुनिया के कमोबेश सभी मुल्कों के राज्याध्यक्ष, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री उनसे दोस्ती करना चाहते, उन्हें अपने देश में आने का न्यौता देते, और उनकी फिल्म  दिखाने की गुज़ारिश करते। उनकी पैदाइश १८८९ में लंदन में हुई। बचपन उदासी और मायूसी में बीता, तो जवानी के चालिस बरस अमरीका में रहकर फिल्मी दुनिया पर राज किया। उम्र के आखिरी पड़ाव ने अमरिका की ख़ुफ़िया एजेंसी एफबीआई ने कम्यूनिस्ट होने का आरोप लगाया। एफबीआई ने कहा, कि अगर कम्यूनिस्ट नहीं भी हो तो उनसे सहानभूति ज़रूर रखते हो। यह आरोप उनके गले की हड्डी बन गया। जवानी में जितने रंग देखे, बचपन और बुढ़ापा उतना ही बदरंग रहा। ज़िन्दगी के आखिरी दिन पत्नी ऊना ओ नील के साथ स्विटज़रलैंड में बिताए और वहीं अंतिम सांस ली।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-8766542229197292407?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/8766542229197292407/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=8766542229197292407' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/8766542229197292407'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/8766542229197292407'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='चार्ली चैपलिन की याद में'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-2393784988472576597</id><published>2010-05-20T01:17:00.000-07:00</published><updated>2010-05-20T01:19:09.260-07:00</updated><title type='text'>पत्रकारिता के विश्वविद्यालय में संघ की  घुसपैठ</title><content type='html'>नाम बृज किशोर कुठियाला, पैदाइश  मार्च 1948 शिमला, तालीम समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएट, पता फिलहाल भोपाल, पेशे से पत्रकारिता के पंडित हैं और तबियत से संघ के सिपाही। कुठियाला के कमान संभालने के बाद से माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविघालय की आबो हवा में घुटन का माहौल है लेकिन इस घुटन के खिलाफ बगावत का असर भी दिखने लगा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; 23 मार्च, भगत सिंह की शहादत के दिन छात्रों द्नारा विश्वविघालय की दीवारों पर चस्पा किए गए पर्चों को हटा दिया गया है, कैंटीन के खम्भे पर चिपकी पाश की कविता भी फट चुकी है लेकिन प्रवेश द्वार के उपर लगा एक पर्चा किसी तरह बच गया। यह पर्चा परिसर में आने जाने वालों का कुछ इस तरह स्वागत करता है, “मैं विरोध में हूं क्योंकि मुझे अपना होना प्रमाणित करना है, हमें समाज में ऊंच नीच की भावनाओं को बदलना होगा, संघर्ष ही हमें परिष्कृत बनाएगा, इंकलाब ज़िन्दाबाद”। यह पर्चा विश्वविघालय के कुलपति प्रोफेसेर बृज किशोर कुठियाला की कारगुजारियों के विरोध में लगाया गया है जो देश में पत्रकारिता के इकलौते विश्वविघालय को संघ की पाठशाला बनाने की फिराक़ में हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आबोहवा बदलने के साथ विश्वविघालय के पाठ्यक्रम भी नए कलेवर के हो गए है। इस कलेवर में भगवा संगठनों का असर दिखता है। भगवा रंग के प्रतीक इस विश्वविद्यालय के नए सत्र की शरुआत एक भव्य यज्ञ से होगी । इस सत्र से शुरु हो रहे 14 नए पाठ्यक्रम में मीडिया प्रबंधन, मीडिया शोध, मनोरंजन संचार, कारपोरेट संचार में एमबीए कराया जाएगा। इसके अलावा भारतीय संचार परम्पराएं और योगिक स्वास्थ्य प्रबंधन एंव अध्यात्मिक संचार में पीजी डिप्लोमा दिया जाएगा। इन कोर्सेज़ को संचालित करने के लिए 50 ऐसे नए संकाय सदस्यों की भरती की जाएगी जो “राष्ट्रवादी” प्रष्ठभूमि के होगें। सूत्र बताते हैं कि भरती का उद्देश्य विश्वविघालय में अपने लिए एक मज़बूत लाबी तैयार करना है ताकि भविष्य में किसी भी कार्य योजना को आसानी से लागू किया जा सके। है। हाल ही में कुठियाला ने सौरभ मालवीय नाम के एक शख्स को अपने सहायक के तौर पर नियुक्त किया है। सौरभ इसी विश्वविघालय से “मीडिया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” पर पीएचडी कर रहा है और बीके कुठियाला उसके गाइड हैं। सौरभ और कुठियाला की यारी नई नहीं है। कुठियाला जब कुरुक्षेत्र विश्वविघालय के मीडिया विभाग में पढ़ाते थे तभी से सौरभ के गाइड हैं और कुलपति का पद धारण करने के बाद सौरभ को दिल्ली से भोपाल बुला लिया। दरअसल सौरभ मालवीय पीएचडी में दाखिला लेकर दिल्ली चला गया था और वहां भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर के लिए बतौर मीडिया प्रभारी काम कर रहा था। दिलचस्प है सौरभ मालवीय जिस विश्वविघालय से पीएचडी कर रहा है वहीं से एक कर्मचारी के रुप में 12000 रुपए की तनख्वाह भी उठा रहा है। कुलपति का दुलरुआ होने के नाते सौरभ विश्वविघालय के दीगर संसाधनों का भी उपभोग कर रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वविघालय का भगवाकरण करने में जुटे कुठियाला उन छात्रों के भविष्य से भी खेल रहे हैं जो बड़ी मुश्किल से उच्च शिक्षा तक पंहुच पाते हैं। विश्वविघालय के मौजूदा छह कोर्सेज़ में हर साल करीब 250 छात्र छात्राएं प्रवेश पाते थे लेकिन नौकरी आधे फीसदी को भी नहीं मिल पाती थी। ऐसे में संचार परंपराएं और अध्यात्म प्रबंधन में डिप्लोमा करने वाले छात्र नौकरी के लिए किसका दरवाज़ा खट खटाएगें, एक बड़ा सवाल है। नौकरी के लिए परेशान कुछ छात्र अपनी फरियाद लेकर कुलपति के पास गए थे लेकिन निराश होकर लौटे। मीडिया में बीके कुठियाला की पंहुच कितनी है यह अलग बात है लेकिन कुलपति अपने चहेते छात्रों का प्लेसमेंट कराते हैं। हाल ही में उन्होने आडियो विज़ुअल विभाग के छात्र आशुतोष चतुर्वेदी को भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के मीडिया सेल में प्लेस कराया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्वविघालय की फ़िज़ा बिगाड़ने की क्या तैयारी चल रही है इसका एक नमूना 17 मई को विश्वविघालय परिसर में पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के निधन पर आयोजित शोक सभा में देखने को मिला। इस दौरान छात्रों को एक प्रश्नावली बांटी गई जिसका शीर्षक गीता में संचार तत्वों का विश्लेषण था। इस प्रश्नावली में कुल 20 प्रश्न पूछे गए थे। प्रश्न संख्या 15 में पूछा गया है कि, क्या आपको लगता है कि गीता में जब अर्जुन धनुष त्यागकर युद्ध करने से मना कर देता है तब वह अवसाद की स्थिति में चला जाता है। प्रश्न संख्या 16, क्या कृष्ण के संचार के कारण ही वह प्रेरणा लेकर युद्ध के लिए पुनः तैयार होता है। प्रश्न संख्या 18, गीता में जो संदेश है क्या वह संचार की दृष्टि से वर्तमान में प्रासंगिक है। प्रश्न संख्या 19, क्या संचार या जनसंचार के पाठ्यक्रमों को गीता में शामिल किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि विश्वविघालय में इस साल से शुरु हो रहे 14 नए कोर्सेज़ के लिए पाठ्यक्रम तैयार किए जा रहे हैं। संचार परम्पराएं और योगिक स्वास्थ प्रबंधन एंव अध्यात्मिक संचार जैसे डिप्लोमा कोर्सेज़ के पाठ्यक्रम में गीता को शामिल करने की तैयारी चल रही है। यही नहीं विश्वविघालय में एम. फिल का कोर्स भी शुरु किया गया है जिसमें सदंर्भ पुस्तक के रुप में एकात्म मानववाद को शामिल किया गया है। इस सिद्धांत के जनक पंडित दीन दयाल उपाध्याय थे जो जनसंघ के संस्थापक सदस्य होने के साथ साथ पहले महासचिव थे और बाद में जनसंघ के अध्यक्ष बने। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एंव संचार विश्वविघालय में ब्रज किशोर कुठियाला की ताजपोशी 19 जनवरी 2010 को हुई और उसी दिन से विश्वविघालय में नई परम्पराएं गढ़ी जाने लगीं। 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन सबसे पहले वंदे मातरम का पाठ हुआ, फिर झंडा रोहण और अंत में राष्ट्रंगान। 30 जनवरी को माखन लाल चतुर्वेदी की पुण्य तिथि पर हुए कार्यक्रम की शुरुआत भी वंदे मातरम से हुई। विश्वविघालय में अब गोष्ठी, सेमिनार या फिर किसी भी कार्यक्रम से पहले वंदे मातरम का पाठ ज़रुरी है। विश्वविघालय में संघ परिवार की सीधे तौर पर आमद भी हो चुकी है। 8 मार्च 2010, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर कुठियाला के निजी कांफ्रेसं रुम में मीडिया की नवीन दिशाएं विषय पर एक गोपनीय कार्यक्रम हुआ। कवरेज के लिए गए विश्वविघालय के इलेक्ट्रानिक्स विभाग के छात्रों को कुठियाला ने मना कर दिया। निजी कांफ्रेसं रुम में छात्रों और संकाय सदस्यों का प्रवेश प्रतिबंधित करके मीडिया की कौन सी नवीन दिशाएं तय की जा रही थीं इसकी तहक़ीकात ज़रुरी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीके कुठियाला की नियुक्ति के बाद परिसर में आरएसएस के कैडरों का जमावड़ा लगना शुरु हो गया है। सबसे पहले आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख मनमोहन वैघ का आगमन हुआ जिन्होने आरएसएस की उपलब्धियों पर व्याख्यान दिया। इस दौरान जब छात्रों ने सवाल के ज़रिए मनमोहन वैघ को घेरना चाहा तो कुलपति ने हस्तक्षेप करते हुए छात्रों से सिर्फ वैघ जी को सुनने के लिए कहा।  डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक और भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय भी यहां के छात्रों को पत्रकारिता के गुर सिखा कर जा चुके हैं। संघ के भारतीय नक्शे के मुताबिक मध्य प्रदेश के एक प्रांत मध्य भारत के प्रांत कार्यवाहक हेमंत मुक्तिबोध भी विश्वविघालय का दौरा कर चुके हैं। हिंदु कैलेंडर के अनुसार नए साल के मौके पर नव वर्ष प्रतिपदा का महत्व विषयक गोष्ठी में हेमंत मुक्तिबोध ने अपने विचार छात्र छात्राओं के साथ साझा किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माखन लाल चतुर्वेदी के जन्म दिवस यानी चार अप्रैल को कुठियाला ने एक भव्य कार्यक्रम भोपाल के समन्वय भवन में आयोजित करवाया जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा की चुनौतियां विषयक गोष्ठी में बोलने के लिए असम और जम्मू कश्मीर के पूर्व राज्यपाल लेफ्टीनेंट जनरल एस के सिन्हा पधारे। याद रहे कि यह वही एस के सिन्हा हैं जिन्होने 90 के दशक में असम में शांति के नाम पर न जाने कितनों को कत्ल करवा दिया। यह वही एस के सिन्हा हैं जिनपर जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद ने आरोप लगाया था कि मालेगांव धमाकों का आरोपी दयानंद पाण्डेय 2007 में जम्मू कश्मीर के राज भवन में इनका मेहमान था। दिलचस्प है कि पत्रकारिता के पुरोधा के जन्म दिवस पर मुख्य अतिथि एस के सिन्हा माखन लाल का स्मरण करने के बजाए बाहरी और आंतरिक चुनौतियों को पहचानने की वकालत कर रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय को संघ का अखाड़ा बनाने पर आमादा बीके कुठियाला अति महत्वाकाक्षीं ब्राहम्ण होने के साथ साथ संघ में गहरी पैठ रखते हैं। सूत्र बताते हैं कि कुठियाला की नियुक्ति में संघ ने निर्णायक भूमिका निभाई थी। प्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को दिल्ली बुलाकर संघ ने कुठियाला की नियुक्ति का आदेश दिया था। विश्वविघालय में नए कुलपति के लिए प्रदेश मुख्यमंत्री ने तीन सदस्यीय कुलपति खोज कमेटी बनाई थी जिसमें भाजपा के पूर्व राज्य सभा सांसद चंदन मित्रा, पत्रकार नंद किशोर त्रिखा और राधेश्याम शर्मा शामिल थे। आमतौर पर किसी भी विश्वविघालय में कुलपति के तलाश के लिए बनाई गई सर्च कमेटी के सदस्यों का उस विश्वविघालय से सम्बंध नहीं होता है लेकिन इस कमेटी के तीनों सदस्य विश्वविघालय से सीधे तौर पर जुड़े थे। नंद किशोर त्रिखा जहां विश्वविघालय की अकादमिक परिषद के सदस्य थे वहीं राधेश्याम शर्मा प्रबंध उप समिति के सदस्य थे। चंदन मित्रा दिल्ली में पायनियर मीडिया स्कूल को चलाते हैं जो माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय से ही संबद्ध है। दिलचस्प बात यह है कि ब्राह्मण के नाम पर बने विश्वविघालय में कुलपति की तलाश के लिए बनी कमेटी में बहुमत ब्राह्मण सदस्यों का था जिसने कुलपति के रुप में संघ की प्रष्ठभूमि वाले ब्राह्मण को ही चुना। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहां यह जानना भी बेहद ज़रुरी है कि प्रोफेसर ब्रज किशोर कुठियाला सिर्फ एम ए पास हैं वो भी पत्रकारिता में नहीं बल्कि समाजशास्त्र और मानवशास्त्र में। सूत्रों की माने तो प्रोफेसर कुठियाला के एम ए में अंक भी संतोषजनक नही है लेकिन कुठियाला के बायोडेटा में दी गई सूचनाओं के मुताबिक वह देश में मीडिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय जनसंचार संस्थान में प्रशिक्षण लिया है और उसी संस्थान में 21 साल तक शिक्षक रहे हैं। इसके इतर वह यूजीसी, इग्नू, एनसीइआरटी, 16 विश्वविघालयों और 22 उच्च शिक्षण संस्थानों में सक्रिय रुप से सहयोग भी देते रहे हैं। देश के उच्च कोटि के शिक्षण संस्थानों को सेवा देने वाले प्रोफेसर कुठियाला गुरु श्रेष्ठ एंव सर्वश्रेष्ठ संचारक जैसे पुरुस्कार से सम्मानित हो चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दरअसल बीके कुठियाला के 38 सालों के सफल कैरियर पर हमेशा संघ की कृपा रही है। कुठियाला अपनी युवा अवस्था से ही संघ की सेवा करते रहे और संघ इन्हे पुरुस्कृत करता रहा। सूत्रों के अनुसार, आरएसएस ने गोधरा कांड की जांच करने और रिपोर्ट बनाने के लिए एक कमेटी बनाई थी जिसके सदस्य कुठियाला भी थे। इसके अलावा वह आरएसएस की समाचार एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार के सदस्य हैं। संघ के ही एक पत्रकार और कुठियाला के मित्र श्याम खोसला चंडीगढ़ में पंचनाद नाम से एक संस्थान चलाते हैं जहां गीता में संचार के महत्व का का पाठ पढ़ाया जाता है, कुलपति महोदय इस संस्थान के निदेशक हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संघ के इस सिपाही की पंहुच कहां तक है इसकी ताज़ा मिसाल कुछ दिन पहले देखने को मिली। भारतीय प्रेस परिषद पत्रकारिता के लिए एक आदर्श पाठ्यक्रम बनाने की तैयारी कर रहा है। इस काम के लिए प्रबुद्ध पत्रकारों और पत्रकारिता के शिक्षकों की एक कमेटी बनाई गई है जिसका समन्यवक बीके कुठियाला को बनाया गया है। पत्रकारिता की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था में संघ की घुसपैठ एक बड़े खतरे की ओर इशारा करती है। चिंता की बात यह है कि क्या भारतीय प्रेस परिषद को कुठियाला की प्रष्ठभूमि का पता नहीं है और अगर है तो इतने महत्वपूर्ण पद की ज़िम्मेदारी उसे कैसे सौंप दी गई। रोचक बात यह है कि कमेटी में देश के नामवर पत्रकार और शिक्षक भी जुड़े हैं लेकिन उनमें से भी किसी ने इसके खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई। कुठियाला की समन्यवक के पद पर नियुक्ति और कमेटी के सदस्यों की चुप्पी बताती है कि देश में पत्रकारिता जैसे “पवित्र पेशे” के साथ क्या हो रहा है और भविष्य में क्या होगा। &lt;br /&gt;खैर, माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविघालय में 2009-10 का सत्र खत्म होने वाला है। नए सत्र में होने वाले भव्य यज्ञ के लिए विशेष अतिथियों की फेहरिस्त तैयार की जा रही है। छात्रों से कहा जा रहा है कि चाहो तो विश्वविघालय परिसर में शाखा लगा सकते हो, मैं भी आउंगा। प्रोफेसर बीके कुठियाला पत्रकारिता के छात्रों के लिए गणवेश डिज़ाइन कर रहे हैं जिसका रंग खाकी और सफेद होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-2393784988472576597?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/2393784988472576597/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=2393784988472576597' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/2393784988472576597'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/2393784988472576597'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='पत्रकारिता के विश्वविद्यालय में संघ की  घुसपैठ'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-3677182858955989927</id><published>2010-02-22T03:15:00.000-08:00</published><updated>2010-02-22T03:18:07.745-08:00</updated><title type='text'>वे अमन के खिलाफ हैं</title><content type='html'>साल-दर-साल क्रिकेट प्रेमियों में आईपीएल का खुमार बढ़ता जा रहा है।&lt;br /&gt;आईपीएल-3 के लिए क्रिकेट खिलाड़ियों की नीलामी 19 जनवरी को मुकर्रर की&lt;br /&gt;गई। आठ फ्रैंचाईज़ियां बोली लगाने के लिए तैयार थीं। खिलाड़ियों की&lt;br /&gt;खरीदारी में उघोगपति विजय माल्या और नेस वाडिया से लेकर प्रीति ज़िंटा और&lt;br /&gt;शिल्पा शेट्टी कुंद्रा जैसे फिल्मी सितारे शुमार थे। बोली शुरु हुई और&lt;br /&gt;सबसे मँहगे खिलाड़ी के तौर पर न्यूज़ीलैंड के शेन बांड और वेस्टइंडीज़ के&lt;br /&gt;पोलार्ड का नाम आया। खिलाड़ियों की खरीदारी पूरी हुई लेकिन आईपीएल-3 में&lt;br /&gt;भाग ले रही किसी भी टीम की सूची में पाकिस्तान के किसी  भी खिलाड़ी का&lt;br /&gt;नाम नहीं आया। ऐसा नहीं है कि बोली के लिए पाकिस्तान के खिलाड़ियों का&lt;br /&gt;नामाकंन नहीं हुआ था। पाकिस्तान के कुल ग्यारह खिलाड़ियों का बोली का&lt;br /&gt;हिस्सा थे लेकिन फिर भी किसी फ्रैंचाइज़ी ने उनमें दिलचस्पी नहीं दिखाई।&lt;br /&gt;आईपीएल पूरी तरह से एक व्यवसायिक प्रतियोगिता है और फ्रैंचाइज़ी टीमें&lt;br /&gt;खिलाड़ियों के प्रदर्शन को देखकर उनकी बोली लगाती हैं। इस लिहाज़ से देखा&lt;br /&gt;जाए तो पाकिस्तानी खिलाड़ियों को टाप लिस्ट में होना चाहिए था। पाकिस्तान&lt;br /&gt;बीसम- बीस क्रिकेट का विश्व चैंपियन है और आईपीएल- 1 के मैन आफ द सिरीज़&lt;br /&gt;पाकिस्तान के तेज़ गेंदबाज़ सोहेल तनवीर थे। फ्रैंचाइज़ी टीमों का तर्क&lt;br /&gt;है पाक खिलाड़ियों को वीज़ा मिलना निश्चित नहीं था। और किसी खिलाड़ी के&lt;br /&gt;उपर दांव लगाने के बाद उसका टीम में शामिल नहीं होना हमारे लिए परेशानी&lt;br /&gt;का सबब बन सकता था। अगर यह बात सही है तो फिर बोली के लिए पाक खिलाड़ियों&lt;br /&gt;का चयन ही क्यों किया गया? आईपीएल के नियमों के मुताबिक, अगर कोई&lt;br /&gt;फ्रैंचाइज़ी टीम किसी खिलाड़ी में दिलचस्पी रखती है तो उसका नाम बोली की&lt;br /&gt;सूची में होना ज़रुरी है। पाकिस्तान के 11 खिलाड़ियों का नाम सूची में छः&lt;br /&gt;जनवरी को डाला गया जो कि बिना किसी फ्रैंचाइज़ी की दिलचस्पी के मुमकिन&lt;br /&gt;नहीं था। अब सवाल यह है कि दिलचस्पी होने के बावजूद किसी पाकिस्तानी&lt;br /&gt;खिलाड़ी के लिए बोली क्यों नहीं लगी? दूसरा तर्क टूर्नामेंट में पाक&lt;br /&gt;खिलाड़ियों की उपलब्धता को लेकर दिया जा रहा है। लेकिन यह तर्क सिर्फ पाक&lt;br /&gt;खिलाड़ियों को ही ध्यान में रखकर क्यों दिया जा रहा है। ऐसा तो किसी भी&lt;br /&gt;खिलाड़ी के साथ हो सकता है कि उसे बीच में ही टूर्नामेंट छोड़कर वापस&lt;br /&gt;जाना पड़े। गौरतलब है कि आईपीएल- 2 के सबसे मंहगे खिलाड़ी केविन पीटरसन&lt;br /&gt;और एंड्रयू फ्लिंटाफ को टूर्नामेंट के बीच में ही वापस जाना पड़ा था।&lt;br /&gt;अफसोस इस बात का है कि फ्रैंचाइज़ी टीमों की सारी बातें मनगढ़ंत और सिर्फ&lt;br /&gt;एक ढकोसला है। भारत सरकार ने आइपीएल-3 में शामिल होने के लिए पाकिस्तान&lt;br /&gt;के 17 खिलाड़ियों को वीज़ा जारी किये। ये वीज़ा दिसम्बर, 2009 और जनवरी,&lt;br /&gt;2010 में जारी किये गए। ऐसे में वीज़ा न जारी होने की बात भी पूरी तरह से&lt;br /&gt;निराधार है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खैर मुद्दे की बात, पाकिस्तानी खिलाड़ियों की टूर्नामेंट में बोली न लगने&lt;br /&gt;से दोनों देशों के बीच तनाव का माहौल बन गया है। नतीजतन, पाकिस्तान के&lt;br /&gt;नेशनल एसेंबली की अध्यक्ष फहमीदा मिर्ज़ा ने संसदीय दल का भारत- दौरा&lt;br /&gt;रद्द कर दिया। पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमान मलिक का कहना है कि भारत ने&lt;br /&gt;पाकिस्तानी खिलाड़ियों का अपमान किया है और इससे यह पता चलता है कि भारत&lt;br /&gt;दोनों देशों के बीच शांति- प्रक्रिया को लेकर गंभीर नहीं है। मलिक ने यह&lt;br /&gt;भी कहा कि जो पाकिस्तान का सम्मान नहीं करेगा, पाकिस्तान भी उसके साथ&lt;br /&gt;वैसा ही व्यवहार करेगा। भारत के विदेश मंत्री एस एम कृष्णा ने पाकिस्तान&lt;br /&gt;की प्रतिक्रिया का जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान खेल को राजनीति से&lt;br /&gt;जोड़कर न देखे। आईपीएल में जो कुछ हुआ उसका भारत सरकार से कोई लेना देना&lt;br /&gt;नहीं है। ठीक बात है कि खेल को सियासी चश्मे से नहीं देखना चाहिए। लेकिन&lt;br /&gt;दोनों ओर से खेल के मुद्दे पर हो रही बयानबाज़ी ने सियासी रुख अख्तियार&lt;br /&gt;कर लिया है। पाकिस्तान के केबल आपरेटरों ने आईपीएल का प्रसारण करने वाले&lt;br /&gt;टीवी चैनलों का बहिष्कार करने की बात कही है। जमात-ए-इस्लामी के मुखिया&lt;br /&gt;मुनव्वर हसन ने भारतीय फिल्मों और उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की&lt;br /&gt;है। वहीं पाकिस्तानी खिलाड़ियों को आईपीएल में न लेने के पीछे यह आशंका&lt;br /&gt;भी व्यक्त की जा रही है कि पाक खिलाड़ियों के खेलने पर भगवा संगठन मैच को&lt;br /&gt;बाधित कर सकते हैं। आईपीएल आयोजन के पीछे की सोच पैसा कमाना है और इस सोच&lt;br /&gt;ने दोनों देशों के नाज़ुक सम्बंधों को नज़रअंदाज़ किया है जिसकी वजह से&lt;br /&gt;खेल ने सियासी रंग ले लिया और दोनो देशों के बीच तनाव का माहौल बन गया।&lt;br /&gt;और सिर्फ तनाव ही नहीं बढ़ा बल्कि शांति प्रक्रिया को भी प्रभावित किया।&lt;br /&gt;भारत और पाकिस्तान के सम्बधं अचानक ही खराब नहीं हुए हैं। मुबंई हमले के&lt;br /&gt;बाद भारत- पाक के बीच तनाव बढ़ा गया था और फिलहाल दोनों देशों के सम्बंध&lt;br /&gt;बेहद नाज़ुक मोड़ पर है। आईपीएल प्रबंधन चाहता तो इसे मुद्दा बनने से बचा&lt;br /&gt;सकता था। प्रबंधन देश के राजनैतिक हालात को ध्यान में रखकर पाकिस्तान के&lt;br /&gt;खिलाड़ियों को पहले ही मना कर सकता था। इस टूर्नामेंट का दूसरा मकसद खेल&lt;br /&gt;के ज़रिये लोगों का मनोरंजन करना है लेकिन आईपीएल ने दोनों देशों के खेल&lt;br /&gt;प्रेमियों को भी मायूस किया है। बहरहाल आईपीएल- 3 कितना सफल होता है, यह&lt;br /&gt;लोगों का कितना मनोरंजन करता है, आईपीएल का भविष्य क्या है  ये अलग बात&lt;br /&gt;है। लेकिन आईपीएल ने उन ताकतों के हाथ में एक मुद्दा जरुर दे दिया है जो&lt;br /&gt;भारत- पाकिस्तान के बीच अमन कायम होते नहीं देख सकते। इसमें कट्टरपंथी&lt;br /&gt;ताकतों से लेकर इस्लामाबाद-नई दिल्ली के सियासी हुक्मरान तक शामिल हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-3677182858955989927?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/3677182858955989927/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=3677182858955989927' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/3677182858955989927'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/3677182858955989927'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2010/02/blog-post_22.html' title='वे अमन के खिलाफ हैं'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-1468827295559919090</id><published>2010-02-22T00:49:00.001-08:00</published><updated>2010-02-22T00:49:49.616-08:00</updated><title type='text'>अदभुत गणतंत्र के अदभुत षडयंत्र</title><content type='html'>समझ में नहीं आता कि कहां से शुरु करें इस झूठे लोकतंत्र की सच्ची कहानियां । जहां तक सोंचता हूँ, जिधर भी देखता हूँ घोर निराशा, हताशा और अंधेरा दिखाई देता है। फिर भी, बात तो करनी ही होगी। आज़ादी मिली तो गुलामी की संस्कृति खत्म होने की उम्मीद थी लेकिन मौजूदा भारत की तस्वीर यह है कि सत्ता बदली है, समाज नहीं। गुलामी खत्म नहीं हुई बल्कि उसका चरित्र और विकृत हो गया है और ये प्रक्रिया लगातार जारी है। गांधी और लोहिया नहीं रहे जो समाज के आखिरी आदमी की बात करते थे। आधुनिक भारत के राजनेता से मदद और इंसाफ की उम्मीद बेमानी है। सोंचता हूं कि आज़ाद भारत में हुए दंगों पर लिखूं कि कैसे धर्माधं दंगाइयों ने मासूम बच्चों, कमज़ोर औरतों से लेकर लाचार बूढ़ों को बेरहमी से कत्ल कर दिया और छुट्टा सांड़ की तरह बिना किसी डर और खौफ के घूमते रहे। कभी-कभी मुझे भारत के उन दुधमुहे बच्चों का ख्याल आता है जो हर साल लाखों की तादाद में सिर्फ इसलिए मर जाते हैं क्योंकि उनका प्राथमिक इलाज नहीं हो पाता। समझ में नहीं आ रहा कि सालों से मणिपुर और कश्मीर में भारतीय सेना के बर्बर कारनामों की बात करने पर कहीं विकासशील भारत के विकास में रुकावट न पैदा हो जाए। तो क्या मैं इस देश की उस क्रूर मिट्टी को कोसूं जिसने 12 सालों में 2 लाख से ज़्यादा किसानों को ही निगल लिया। या फिर उस सरकारी फरमान की बात करुं जिसने भूख से बिलबिलाते बच्चों के मुंह से अनाज छीनकर उसे शराब की भठ्ठी में पंहुचा दिया। ठीक है तो फिर मैं दुनिया में तेज़ी से बढ़ते भारतीय अरबपतियों की तादाद पर बात करुगां कि ये अमीर कैसे बने? लेकिन नहीं, बात तो फिर वहीं पहुंच जायेगी, देश की भूखी नंगी जनता पर। क्योंकि बढ़ते अरबपतियों की अमीरी के किस्से में ही देश के गरीबों की कहानी छुपी हुई है। अच्छा तो उन बागियों की बात करते हैं जिन्होने भारतीय शासक वर्ग की तथाकथित लोकतांत्रिक व्यवस्था को खारिज कर दिया है और हिन्दुस्तान के 90 हज़ार गांवों पर अपना राज चला रहे हैं। लेकिन क्या ये सचमुच बागी हैं ? हां जो राष्ट्र की नीतियों के खिलाफ हैं वो बागी हैं। तो क्या सदियों से बनाये उनके मिट्टी के घरौदों को सरकारी बुलडोज़र से रौंदना ही सरकारी नीतियां हैं, क्या उनकी ज़मीन, उनके जंगल को तबाह करके वहां पूंजी बनाने की मशीन लगाना ही सरकार की नीतियां हैं, क्या आदिवासियों का दमन और लूट मचा करके अरबपतियों की संख्या बढ़ाना सरकार की प्राथमिकता है? अगर ये सही नहीं है तब तो वे बाग़ी हैं और अगर ये गलत है तो हर सरकारी बुलडोज़र के आगे आदिवासी खड़े दिखेंगें। लेकिन इससे क्या होगा? क्योंकि मिट्टी के घरों को रौंदने वाले ये बुलडोज़र अब आग उगलने वाले तोपों की शक्ल ले चुके हैं। क्या लाठी- डंडें, तीर- कमान से सजी आदिवासियों की सेना सरकारी आग के गोले को भेद पायेगी? शायद नहीं क्योंकि उस सरकारी आग के गोले में अरबपतियों की शक्तिशाली पूंजी लगी है जो आदिवासियों के फौलादी जज़्बे को छिन्न भिन्न कर देने की क्षमता रखती है। ठीक है मैं उन अभागे आदिवासियों के संघर्ष को भुला दूगां, मैं आये दिन बढ़ती मंहगाई और कर्ज़ में डूबने की वजह से आत्महत्या करने वाले परिवारों को भी याद नहीं करुगां। मैं आधुनिक भारत के उन नागरिकों की भी बात नहीं करुंगा जो करोड़ों में हैं और रोज़ भूखे पेट सो जाते हैं। मैं मुम्बई की लोकल ट्रेन में सफर करने वाले उस मध्यवर्गीय वर्ग की भी बात नहीं करुगां जो अक्सर बिन बुलायी मौत के शिकार हो जाते हैं, जो जानते हैं कि वे मौत की ट्रेन पर सफर कर रहे हैं लेकिन ये सफर करना उनकी मजबूरी है। मैं कानून का मज़ाक बनाने वाले डीजीपी राठौर और हर रोज़ मरने वाली रुचिका को भी भुला दूंगा। मैं सब कुछ भुला दूंगा, देश की चारों दिशाओं से आने वाली उन सिसकियों को भी भुला दूंगा जो एक वक्त के बाद खुद-ब-खुद खामोश हो जाती है लेकिन मैं उस देवी को कैसे भूलूं जो दुर्भाग्य से ज़िन्दा है, जिसकी मौजूदगी का एहसास हर वक्त होता है, जिसने सालों से अपना व्रत अनवरत जारी रखा है, जो आये दिन किसी अखबार में छोटी सी जगह घेरकर हमें अपने विरोध का एहसास कराती है। जी हां मैं इरोम शर्मिला की बात कर रहा हूं जिसके इरादे एल्पस और पेरनीज़ की चट्टानों से भी मज़बूत दिखते हैं। जिसका धैर्य इतने सालों के भी बाद जवाब नहीं दे रहा। हां मैं उसी इरोम शर्मिला की बात कर रहा हूं जो सरकार के उस बर्बर कानून का विरोध कर रही है जिसका शिकार मणिपुर के सैकड़ों बेगुनाह हो चुके हैं। कहना गलत नहीं होगा कि जो सरकारी गोली राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर बेगुनाह नौजवानों के सीने में उतारी जा रही है उनमें से ही कोई अन्तर्राष्ट्रीय फलक पर भारत की एक नई परिभाषा गढ़ सकता था। लेकिन अफसोस कि भारतीय शासक वर्ग को भारत की चिन्ता कम और अपने घर की ज़्यादा है वरना भारतीय सेना उन नायाब हीरों पर गोलियां चलाने से पहले कम से कम सोंचती ज़रुर। क्या ऐसे ही गणतंत्र का ख्वाब गांधी ने देखा था जिसमें साठ सालों के बाद भी देश भूख, बिमारी और लाचारी का शिकार है। मन में एक सवाल गूंज रहा है कि क्या यही गणतंत्र है? और अगर यही गणतंत्र है तो अदभुत बला है ये गणतंत्र।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-1468827295559919090?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/1468827295559919090/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=1468827295559919090' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/1468827295559919090'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/1468827295559919090'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title='अदभुत गणतंत्र के अदभुत षडयंत्र'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-4868551934382816442</id><published>2009-11-19T03:22:00.000-08:00</published><updated>2010-10-10T04:00:52.291-07:00</updated><title type='text'>करो तुम पाप पर मुझसे तो यह हरगिज़ नही होगा</title><content type='html'>गांव में कदम रखते ही पुलिस के जवानो को देख शमशाद के पांव ठिठक गए, घर की ओर कदम बढ़ाते ही पुलिसवालों ने  पास बुलाकर एक कागज़ पर दस्तख़त करने को कहा. पूछने पर पता चला &lt;span&gt;कि&lt;/span&gt; मुकदमा दर्ज है। गांव में जाने पर पता चला कि घर वाले भी मुकदमे की ज़द में हैं, मुहल्ले के साथियों से सुना कि गांव के कई लोग थाने में नामजद है। आरोप,  गांव की शांति भंग करने और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने का।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोरखपुर जिले से पैरा मेडिकल की पढ़ाई कर रहे 19 साल के शमशाद के पांव घर की दहलीज़ पर दस्तक देते हैं। घर में पसरा सन्नाटा और लोगों की आंखो में मौत का खौफ पुरानी याद एक बार फिर ताज़ा कर देती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के महाराजगंज ज़िले के धानी गांव में पिछले दो साल से एक जंग लड़ी जा रही है। जंग, एक ओर अस्मिता और स्वाभिमान की है, तो दूसरी ओर अस्तित्व बचाने और छीने गये अधिकारों को पाने की। दीनानाथ कहते हैं कि हम ब्राह्मण हैं उच्च कोटि के लोग, वो मुसलमान हो मलिछ मुसलमान, देश में फैली तमाम समस्यायों के प्रतीक।&lt;span&gt;यह &lt;/span&gt;देश हिन्दुओ का है और यह गांव  हमारा। वाहिद अली देश की न्याय व्यवस्था से निराश हैं बकौल वाहिद, 1947 मे जब मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान बनाकर मुसलमानो को वहां के  सरसब्ज़ और शादाब बाग़ दिखाये तो हिन्दुस्तान के ज़्यादातर मुसलमानो ने उन्हे नकार दिया, जो लोग गये भी तो उनमे किसी की मजबूरी थी तो किसी की नासमझी, लेकिन इतने सालों के बाद भी हमारी वफादारी पर शक करना सीने मे शूल चुभोने के समान है। दिन ब दिन हमारे अधिकारों को हमसे छीना जा रहा है। स्थानीय लोगों का शिकंजा हम पर बढ़ता जा रहा है और न्याय की उम्मीद घटती जा रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झगड़े की शुरूआत पिछले साल रमज़ान के महीने में 23 सितम्बर 2008 को हुई। जब धानी गांव के दीना नाथ ने स्थानीय मस्जिद का लाउड स्पीकर जबरन बन्द करवा दिया और तहसील दिवस में प्रार्थना पत्र देकर मस्जिद का लाउड स्पीकर हमेशा के लिए बंद करने को कहा। तत्कालीन पुलिस क्षेत्राधिकारी डी0 एन0 द्विवेदी ने 25 सितम्बर को समझौता करवाया कि मस्जिद में केवल फज़र व मगरिब यानी कि सिर्फ दो बार लाउड स्पीकर से अज़ान दी जायेगी। लेकिन गाँव तक पंहुचने से पहले ही समझौता टूट गया। दीनानाथ, भारतीय जनता पार्टी के विधायक बजंरगी सिंह के छोटे भाई और उनके साथियो ने धानी-फरेन्दा मार्ग पर चक्का जाम कर दिया। कारण, लाउड स्पीकर को मस्जिद से हमेशा के लिए बन्द करवाने की मांग। प्रशासन हरकत में आया लेकिन बात नही बनी और अगली सुबह 26 सितम्बर को अलविदा यानी कि रमज़ान महीने के आखिरी &lt;span&gt;शुक्रवार &lt;/span&gt;को धानी गांव में पी0ए0सी0 लगा दी गयी। साम्प्रदायिक तनाव और पुलिस के ख़ौफनाक साये के बीच आने वाली ईद की खुशियों का अन्दाज़ा सभी को था। 27 सितम्बर 2008 की सुबह महाराजगंज जनपद के अपर जिलाधिकारी, पुलिस अघीक्षक, अपर पुलिस अघीक्षक और भारतीय जनता पार्टी के विधायक बजरंगी सिंह अपने साथियों के साथ धानी गांव पंहुचे। पंचायत लगी, शिक्षक वाहिद ने बताया कि रमज़ान महीने में हमे और गांव के मुसलमानो को रोज़ा रखने और खोलने मे परेशानी हो रही है इसलिए कम से कम फज़र और मग़रिब में अज़ान देने की छूट होनी चाहिए लेकिन दीना नाथ और उनके साथियों को अज़ान की आवाज़ से हो रही परेशानियों से मुक्त नही किया जा सका। लिहाज़ा मस्जिद में लाउड स्पीकर का इस्तेमाल हमेशा के लिए बन्द। एक तरफ जीत का शौर्य गूंज रहा था तो दूसरी ओर सिर्फ मायूसी। वक्त बीता और पुलिस के संगीन साये में ईद का त्यौहार भी। लेकिन धानी गांव के अम्नो चैन को बुरी नज़र तो लग चुकी थी। करीब एक साल पहले बनी &lt;span&gt;मस्जिद &lt;/span&gt;की अर्धनिर्मित मीनार पर लटकते बल्ब पर गांव के नागेन्द्र मणि, सतीष धर दूबे आदि ने ऐतराज़ जताया। उन्होंने कहा कि इस मस्जिद में कुछ भी &lt;span&gt;नया &lt;/span&gt;काम नहीं होगा। सालों पहले अपनी ज़मीन मस्जिद के नाम करने वाले गांव के बुज़ुर्ग सहमुल कहते हैं कि इस बल्ब को लगाने का मकसद सिर्फ इतना था कि अज़ान का वक्त होने पर इसे जला दिया जाये तो लोग नमाज़ वक्त पर पढ़ने आ सकेंगे। बल्ब के जलने पर कोई आवाज़ होती नही है तो दूसरे समुदाय के लागों को कोई परेशानी नही होगी लेकिन सहमुल का सोंचना गलत था। दीनानाथ बोले कि इस मीनार पर न तो बल्ब जलेगा और न ही यह अर्धनिर्मित मीनार आगे बनेगी। बेहतर होगा अगर आप लोग इस आधी बनी मीनार को खुद गिरा दें. ऐसा न करने पर दीनानाथ और उनके साथियो ने मीनार को गिराने की धमकी दे दी। 10 लाख से अधिक की आबादी वाले ब्राह्मण बाहुल्य धानी कस्बे में मुसलमानो की आबादी सिर्फ धानी गांव में हैं जिनकी कुल आबादी लगभग 700 है। और उनमें से ज़्यादातर मुसलमान युवक रोज़गार के लिए बड़े शहरो में पलायन कर गये हैं। जो गांव में हैं उनमे से कोई दर्ज़ी है तो कोई नाई। प्रशासन के निराशाजनक रवैय्ये से गांव में अविश्वास की स्थिति पैदा हो गई है। ऐसी स्थिति मे जान माल का डर बन आया है। ग़रीबी और बेरोज़गारी की मार झेल रहे गांव के मुसलमानो पर मस्जिद की मीनार गिराने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सहमुल कहते हैं कि हम अपने हाथों से मस्जिद की मीनार गिराकर गुनाह नही कर सकते जिसे गिराना हो वह खुद जाकर ये पाप कर सकता है। सहमुल की बातों में व्यवस्था के प्रति अविश्वास साफ झलकता. कमज़ोर लोकतन्त्र का इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि ज़ुल्म और ज़्यादती के बाद भी पीड़ितों पर मुकदमा और दोषियों को छूट। शिक्षक अबरार अहमद कहते हैं कि मदद और इन्साफ की उम्मीद कहीं से भी दिखाई नही दे रही है। हमारे ज़ख्मो पर मरहम लगाने के बजाय दैनिक जागरण अख्रबार ने ग़लत ख़बर लिखकर इसे और गहरा कर दिया है। बकौल अबरार, हमारे गांव में एक मदरसा है जो मस्जिद से लगभग आधे किलोमीटर की दूरी पर उत्तर की दिशा में बंधे के पास स्थित है लेकिन अख़बार ने यह लिखकर हमे मायूस कर दिया कि उक्त मस्जिद मे शिक्षण कार्य को लेकर गांव में तनाव है जबकि तनाव की वजह कुछ और ही है। गांव में तनाव को देखते हुए पुलिस ने दोनो पक्षो से आयी तहरीर पर कार्यवाही करते हुए कई लोगो के खिलाफ धारा 107 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है। अबरार मुस्कुराते हुए कहते हैं कि जिन लागों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है उनमे से कई तो दिल्ली और बम्बई मे काम कर रहे हैं और कुछ तो विदेशों में हैं। धानी गांव में बढ़ते तनाव के मद्देनज़र दुबारा पी0ए0सी0 लगा दी गयी थी, फिलहाल हटा दी गयी है लेकिन गांव में पसरा सन्नाटा अभी भी वहीँ है. बहेरहाल उस सन्नाटे में भी एक गूंज है। गूंज उस व्यवस्था के खिलाफ है जो दोषियों पर कार्यवाही करने से कतरा रहे है, गूंज उस दैनिक जागरण के खिलाफ है जिसमे साम्प्रदायिकता की बू आती है, गूंज हर उस शख्स के खिलाफ है जो धानी गांव के अमन पसंद लोगो के सुख और चैन पर धर्म की आड़ में ज़ुल्म की इबारत लिख देना चाहते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-4868551934382816442?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/4868551934382816442/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=4868551934382816442' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/4868551934382816442'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/4868551934382816442'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2009/11/blog-post_19.html' title='करो तुम पाप पर मुझसे तो यह हरगिज़ नही होगा'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1464544315292054486.post-2927637569315864348</id><published>2009-01-29T23:04:00.000-08:00</published><updated>2009-01-29T23:08:13.572-08:00</updated><title type='text'>चराग</title><content type='html'>मई जब भी ढूढने निकला कोई नया सूरज&lt;br /&gt;किसी चराग ने आँखों पर उंगलिया रख दी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1464544315292054486-2927637569315864348?l=sadayen.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sadayen.blogspot.com/feeds/2927637569315864348/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1464544315292054486&amp;postID=2927637569315864348' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/2927637569315864348'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1464544315292054486/posts/default/2927637569315864348'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sadayen.blogspot.com/2009/01/blog-post_29.html' title='चराग'/><author><name>Jazba</name><uri>http://www.blogger.com/profile/04510425613458149573</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='32' height='24' src='http://4.bp.blogspot.com/_WUlBhxFwbUQ/S_t8dzZnU_I/AAAAAAAAAZo/DLQ_MLWDCB0/S220/shahnawaj-1.jpgbn.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry></feed>
